Friday, December 21, 2007

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तुम नियम मंदिरों के बनाते रहे ,
और हम जाने कब देवता हो गये ।प्रेम के पाश मे मन के पाहन सभी,
पूजते-पूजते देवता हो गये ।।
०००००
जो भी अच्छा लगा , शिव उसी मे दिखा,
पूर्ण मन से उसे पूजते ही रहे ।
पर्वतों, कन्दराओं , मठों , मंदिरों
एक भगवान् को ढूँढते ही रहे।
इस जनम , उस जनम , ये कसम , वो कसम
तोड़ते तोड़ते देवता हो गये ।।तुम नियम मंदिरों के बनाते रहे ,
और हम जाने कब देवता हो गये ।।
०००००

1 comment:

Priya said...

aapki lekhani to gazab hain.....ye kavita to sakshat maa saraswati si lagi hamhe