Friday, February 13, 2009


ख़ुद से मुलाकात का मन

तेज हवाओं के झोंके हैं
सन्नाटों का सूनापन ।
और परत दर परत अँधेरा
आधी रात अकेलापन।
०००००००
उठापटक , जीवन की भागमभागों से जब ऊब गया ।
तब - तब चाहे अनचाहे मैं बिन पानी के डूब गया । ।
थामे उंगली रहा भटकता साँसों का बनजारापन । ।
बहुत दिनों के बाद हुआ है ख़ुद से मुलाकात का मन । ।
आधी रात अकेलापन । ।
००००००
मौसम की है छेंड़ आज कुछ मन ज्यादा ही चंचल है ।
सब कुछ तो है ठीक नहीं , कुछ बाहर- भीतर हलचल है । ।
"शलभ" न बांधो अब ऐसे में इस मन का आवारापन । ।
बहुत दिनों के बाद हुआ है ख़ुद से मुलाकात का मन । ।
आधी रात अकेलापन । ।

4 comments:

common man said...

अपने समग्र ज्ञान और अनुभवों का अतिप्रासंगिक निचोड़ जो आप पंक्तियों के माध्यम से प्रेषित करते हैं वह कला अपने आप में बेजोड़ है!!!!
साहित्य सेवा तथा हमारी काव्य पिपासा को तृप्त करने के लिए मित्र आपको कोटि-कोटि धन्यवाद !

Sameer Gupta said...

The poem reflects the experiences u have had and shows how deeply u have experienced life, extremely touching.

jitender said...

excellent way of expressing feeling of love.you really got god gifted tel lent

studio interiors said...

bhaia aaj ki bhag daud bhari zindagi mein, insaan duniya ke jhamelon mein aisa phasta hai ki use pata he nahi chalta ki kab woh jawani se budhape mein kadam rakh chuka hai........ aaj in panktiyon ko padh ke ehsaas ho gaya ki kuch samay khud ko bhi dena chahiye; dhanyawad bhaia, aaj samajh mein aya ki hum khud ko dhokha dete hain, aur jhund mein khud se he chup jaate hain.
What is life??
Kabhi khud ko phone mila ke to dekho
Engage tone sunai degi.
Duniya se milne mein itna vyast hain
Aur khud se milne ki saari liney vyast hain
"THAT'S LIFE"
adbhut panktiyon ka samanvay hai ye kavita.