Saturday, September 27, 2008

कोई जरूरत नहीं ।

कोई जरूरत नहीं
फूल पतझर में भी यदि कहीं जाएँ खिल ,
तो बहारों की कोई जरूरत नहीं ।
आदमी पीर को व्याह ले , खुश रहे ,
तो सहारों की कोई जरूरत नहीं ।।
००००००
एक मुट्ठी सही, छांव अपनों की हो,
हर तपिश ज़िन्दगी में निबह जायेगी।
गर जो डोली को कान्धा श्रवण का मिले,
तो कहारों की कोई जरूरत नहीं ।।
आदमी पीर को व्याह ले , खुश रहे ,
तो सहारों की कोई जरूरत नहीं ।।
००००००
वो कोई और होंगे , चले आए जो ,
हमको मन्झधार में , भंवरों में ले चलो ,
खूब जी भर के यदि डूबने को मिले ,
तो किनारों की कोई जरूरत नहीं ।।
आदमी पीर को व्याह ले , खुश रहे ,
तो सहारों की कोई जरूरत नहीं ।।
००००००








1 comment:

Priya said...

खूब जी भर के यदि डूबने को मिले ,
तो किनारों की कोई जरूरत नहीं ।।

wah shalab ji ... superb!